
मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के उज्जैन (Ujjain) में स्थित शिप्रा नदी (Shipra River) के रामघाट (Ramghat) के नजदीक भैरव पर्वत पर स्थित है प्राचीन श्री हरसिद्धि माता शक्तिपीठ मंदिर (Harsiddhi Mata Temple) । श्री हरसिद्धि माता शक्तिपीठ मंदिर (Harsiddhi Mata Temple), माता सती के 52 शक्तिपीठों में 13वां शक्तिपीठ कहलाता है। कहा जाता है कि यहां माता सती (Mata Sati) के शरीर 13वां टुकड़ा कोहनी भैरव पर्वत नामक इस स्थान पर गिरा था। तब से यह स्थान 13वां शक्तिपीठ (13th Shaktipeeth) कहलाता है।
मंदिर के गर्भग्रह में माता की जो मूर्ति है वह प्राकृतिक आकार में है जिस पर हल्दी और सिन्दूर की परत चढ़ी हुई है। मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार के दोनों ओर भैरव जी की मूर्तियां हैं। मंदिर के गर्भगृह में तीन मूर्तियां विराजमान हैं जिसमें सबसे ऊपर माता अन्नपूर्णा, मध्य में माता हरसिद्धि और नीचे माता कालका (Mata Kalka) विराजती हैं।

हरसिद्धि माता को ‘मांगल-चाण्डिकी’ के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि माता हरसिद्धि की साधना करने से सभी प्रकार की दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। हरसिद्धि माता मंदिर की ख़ास विशेषता है मंदिर प्रांगण में बने लगभग 51 फीट ऊंचे दो दीप स्तम्भ। मान्यता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य (King Vikramaditya) ने करवाया था। ये दीप स्तंभ लगभग 2 हजार साल से अधिक पुराने बताए जाते हैं।
नवरात्री (Navratri) के विशेष अवसर पर इन दीपों को प्रज्वलित किया जाता है। इन दीपमालिकाओं के सैकड़ों दीपक नवरात्री के नौ दिनों तक प्रतिदिन शाम को एकसाथ प्रज्वलित किए जाते हैं। इन दीपकों में लगने वाले तेल और मजदूरी का पूरा खर्च पूरी तरह से दानी सज्जनों द्वारा वहन किया जाता है, जिसके लिए विशेषकर नवरात्रों या अन्य मुख्य अवसरों पर पहले से ही बुकिंग करवा ली जाती है।

शिवरात्रि (Shivratri) , चैत्र व शारदीय नवरात्रि, धनतेरस (Dhanteras) व दीपावली (Deepawali) जैसे प्रमुख अवसरों पर दीप स्तंभ जलाने की बुकिंग तो साल भर पहले ही श्रृद्धालुओं द्वारा करवा दी जाती है। दोनों दीप स्तंभों को एक बार जलाने में लगभग 4 किलो रूई की बाती व 60 लीटर तेल लगता है। समय-समय पर इन दीप स्तंभों की साफ-सफाई भी की जाती है। इन दीप स्तंभों पर चढ़कर हजारों दीपकों को जलाना सहज नहीं है। यह कार्य एक परिवार द्वारा कई सालो से किया जा रहा है।
प्रतिदिन शाम को इन सैकड़ों दीपों को जलाने के तरीके व जलते हुए देखने के लिए यहाँ पर्यटकों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। जितनी इन दीपों की रोशनी मनमोहक है उतना ही इन दीपों को जलाने का तरीका रोमांच भरा है।

उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि (Harsiddhi Mata Temple) के परम भक्त थे:
किंवदंतियों के अनुसार राजा विक्रमादित्य ने 11 बार अपने शीश को काटकर मां के चरणों में समर्पित कर दिया था, लेकिन हर बार देवी मां उन्हें जीवित कर देती थीं। बारहवीं बार जब उन्होंने अपना सिर चढ़ाया तो वह फिर वापस नहीं आया। इस कारण उनका जीवन समाप्त हो गया। आज भी मंदिर के एक कोने में 11 सिंदूर लगे रुण्ड पड़े हैं। कहते हैं ये उन्हीं के कटे हुए मुण्ड हैं। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के परम भक्त थे। मान्यताओं के आधार पर कुछ साधक नवरात्र में गुप्त साधनाएं करने आते हैं। तंत्र साधकों के लिए भी यह स्थान विशेष महत्व रखता है।
मंदिर परिसर में आदिशक्ति महामाया (Mahamaaya) का भी मंदिर है, जहाँ सदैव ज्योति प्रज्वलित रहती है और नवरात्रों के अवसर पर उनकी महापूजा होती है। मंदिर के प्रांगण में शिवजी (Lord Shiv) का कर्कोटकेश्वर महादेव मंदिर भी है जो चैरासी महादेवों में से एक है। श्रद्धालु यहां कालसर्प दोष निवारण के लिए विशेष पूजा अर्चना करवाते हैं।

यह मंदिर सुबह साढ़े पांच बजे से रात साढ़े ग्यारह बजे तक खुला रहता है। इस दौरान माता के प्रसाद के रूप में दूध और मिठाई आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है, जबकि शाम को यहां फलों का प्रसाद चढ़ाया जाता है।
उज्जैन, मध्य प्रदेश का एक प्रमुख शहर है इसलिए यहां पहुंचने के लिए बस, रेल व वायु सेवा उपलब्ध है। वायु सेवा करीब 57 किलोमीटर दूर स्थित इंदौर (Indore) और राजधानी भोपाल (Bhopal) तक उपलब्ध है। मंदिर से रेल्वे स्टेशन व बस स्टैंड की दूरी करीब 1 किलोमीटर है।
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(Disclaimer: इस स्टोरी (लेख) में दी गई सूचनाएं सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित हैं। यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। thenewsworld24 .com इनकी पुष्टि नहीं करता है। इन तथ्यों को अमल में लाने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें।)